पैरा ओलंपिक में देश को मेडल दिलाना चाहती हैं गरिमा

अल्मोडा. इंसान के अगर इरादे मजबूत हो तो वो किसी भी मंजिल को पा ही लेता है। इस बात को सच करके दिखाया है अल्मोड़ा जिले की द्वाराहाट एथलीट गरिमा जोशी ने. जिन्होंने अपने मजबूत इरादों से भी चुनौतियों को हराकर जीत को हासिल किया. गरिमा ने अपने खेल की शुरुआत 2013 में की थी. उन्होंने 2013 में आयोजित देहादून मैराथन में तीसरा स्थान हासिल किया था. उसके बाद 2014 में वह नेशनल गेम्स का हिस्सा भी रहीं और 2015 में उन्होंने नेशनल बास्केटबाँल चैंपियनशिप में भी भाग लिया. गरिमा की इस हिम्मत को राज्य सरकार ने भी सरहाया और बेटी बचाओ और बेटी बढ़ाओं अभियान में उनकी तस्वीर लगाकर उन्हें सम्मानित किया गया.

साल 2018 के मई तक गरिमा ने कई पदक जीते थे, लेकिन 31 मई 2018 की तारिख गरिमा के लिए बहुत ही मनहूस बनकर सामने आई. जब बेंगलुरु में प्रैक्टिस के दौरान उनका एक एक्सीडेंट हो गया. जिसकी वजह से उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई. लेकिन गरीमा ने इस एक्सीडेंट के बाद भी हार नहीं मानी और वह अब पैरा ओलंपिक में देश को मैडल दिलाने के लिए जी जान से कोशिश कर रही हैं. गरिमा ने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि वह लॉकडाउन से ही अपने घर पर हैं. वह जल्द ही बेंगलुरु, दिल्ली और फिर मुंबई जाकर पैरा ओलंपिक की तैयारी में जुट जाएंगी.

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गरिमा ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि वह देश के लिए 2021 में पैरा ओलंपिक मेडल जरूर जीतेंगी. लेकिन साथ में उन्होंने यह भी कहा कि यह सब इतना आसान नहीं है जितना दिख रहा है. क्योंकि गरिमा के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर है और उनका परिवार उनका यह खर्च नहीं उठा सकता. तो वहीं सरकार की तरफ से जो वादे किए गए थे. वो अब तक पूरे नहीं हुए. गरिमा के पिता पूरन जोशी ने बताया कि उनकी पत्नी कैंसर से पीड़ित थी. उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह अपनी पत्नी का ईलाज करा सके. वहीं दूसरी तरफ बेंगलुरु में बेटी का एक्सीडेंट हो गया था.

जिसकी वजह से वह विक्लांग हो गई थी और वहीं पत्नी को सही तरीके से ईलाज न हो पाने के कारण उनकी भी मृत्यु हो गई थी. गरिमा के पिता ने आगे बताया कि बेटी के एक्सीडेंट के बाद राज्य सरकार ने पत्नी और बेटी के लिए मदद का वादा किया था. वह मदद के लिए कई बार सीएम ऑफ़िस के चक्कर काट चुके हैं. लेकिन राज्य सरकार से उन्हें अब तक किसी तरह की कोई मदद नहीं मिली.

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